महेश भट्ट ने भतीजे मोहित की सैयारा सफलता पर जताया गर्व, कहा- महंगे एक्टर्स नहीं बनाते फिल्म हिट

बॉलीवुड के अनुभवी फिल्म निर्माता और लेखक महेश भट्ट इंडस्ट्री में 50 साल से अधिक समय से हैं। इतने वर्षों के अनुभव के बावजूद हर नई फिल्म के पहले उन्हें वही बेचैनी महसूस होती है। हाल ही में बातचीत में फिल्ममेकर ने अपनी आने वाली फिल्म ‘तू मेरी पूरी कहानी’, अनू मलिक की मीटू के बाद वापसी, नए कलाकारों की महत्वता और कम बजट में फिल्म बनाने की चुनौतियों पर बेबाक विचार साझा किए। इंटरव्यू में महेश भट्ट ने मोहित सूरी की सफल फिल्म ‘सैयारा’ का जिक्र करते हुए खुद को मुफासा और मोहित को सिंबा बताया। पढ़िए बातचीत के कुछ प्रमुख अंश।
इतने वर्षों बाद भी फिल्म रिलीज से पहले आपको बेचैनी या डर लगता है?
बिल्कुल होती है। जो फिल्म निर्माता रिलीज से पहले यह रोमांच महसूस करना छोड़ दे, वह सच में फिल्म निर्माण छोड़ चुका है। यह डर नहीं, बल्कि भीतर की बेचैनी है। क्या दर्शक मेरी कहानी समझेंगे, इसे पसंद करेंगे, इसे अपनाएंगे। आप अपनी मेहनत, अपने जज्बात, अपने जीवन का एक हिस्सा स्क्रीन पर रख रहे हैं। बॉक्स ऑफिस या सोशल मीडिया की चर्चाएं मुख्य चीज नहीं हैं, असली मायने दर्शकों के प्यार और प्रतिक्रिया में हैं। यही वह पल है जब आपका फिल्म निर्माण का असली परीक्षण होता है।
प्री-रिलीज की घबराहट आती है तो आप इसे कैसे संभालते हैं?
इसका कोई जादू या आसान तरीका नहीं है। इसे झेलना पड़ता है। थोड़ी राहत तब मिलती है जब ट्रेलर पसंद किया जाए, संगीत अच्छा लगे या शुरुआती रिस्पांस पॉजिटिव हो। लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब लोग सिनेमाघरों में बैठते हैं। अनुभव से आत्मविश्वास आता है, लेकिन यह बेचैनी हमेशा बनी रहती है। डर हमेशा रहता है। क्या मेरी मेहनत रंग लाएगी या नहीं?
बदलते दौर में आपकी फिल्म बनाने की रणनीति क्या होती है?
आज का दर्शक पहले जैसा नहीं रहा। लोग समय की कमी और कंटेंट की भरमार के बीच जी रहे हैं। अगर आप महंगे सेट और बड़े सितारों पर भरोसा करेंगे, तो फिल्म फिसल सकती है। हमारी रणनीति है बड़ी सोच, कम खर्च और बेहतरीन संगीत।नई स्टार कास्ट के लिए दर्शकों का जुड़ाव और माउथ पब्लिसिटी बहुत जरूरी है। कहानी और भावनाएं ऐसी होनी चाहिए कि दर्शक इसे अपने जीवन से जोड़ सके। अगर जुड़ाव नहीं है, तो बड़े नाम भी मदद नहीं करेंगे।
कम बजट में फिल्म सफल और दिलचस्प बनाना कितना मुश्किल है?
बहुत मुश्किल है। ज्यादातर फिल्में इसलिए असफल होती हैं क्योंकि उनका खर्च उनकी ताकत से ज्यादा होता है। महंगे बजट वाली फिल्मों में पुराने तरीके और फॉर्मूला पर फंस जाते हैं, फिल्में नीरस हो जाती हैं। आज के दर्शक सेकंडों में तय कर लेते हैं कि फिल्म देखने लायक है या नहीं। इसलिए कम खर्च में भी दिल से जुड़ी, इमोशनल और सच्चाई वाली फिल्में ज्यादा असर करती हैं। कम खर्च से कुछ नया, अलग और क्रिएटिव करने के रास्ते खुलते हैं और फिल्म असली महसूस होती है।
अभिनेता पर ज्यादा फीस होने पर आपकी राय?
अभिनेता इतनी फीस इसलिए मांगते हैं क्योंकि निर्माता खुद डर के मारे जोखिम लेने से कतराते हैं। यह वैसा है जैसे हीरे जड़े सहारे पर चलना… महंगा, दिखने में शानदार, लेकिन असल में बस सहारा ही है। असली फिल्म निर्माता को अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ता है। डर से नहीं, प्यार से फिल्म बनानी चाहिए। दर्शक हमेशा अनुमानित नहीं होते। पुराने हिट्स या पुराने तरीके थोड़ी देर के लिए काम करते हैं। असली सफलता सिर्फ जोखिम और नए प्रयोग में है। नए फिल्मकारों का साहस ही दर्शकों को बांधता है।



