कैकेयी के राम : मातृत्व और मर्यादा की अनसुनी गाथा

मुख्यमंत्री के प्रेस सलाहकार रहीस सिंह की पुस्तक पर वरिष्ठ पत्रकार प्रणय विक्रम सिंह की समीक्षा

पुस्तक समीक्षा, प्रणय विक्रम सिंह : रामकथा केवल एक राजकुमार की वनगमन यात्रा नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे ईश्वरत्व के उद्घाटन की साधना है। ‘कैकेयी के राम’ नामक यह औपन्यासिक कृति, सुप्रसिद्ध लेखक डॉ. रहीस सिंह द्वारा रचित और वाणी प्रकाशन से प्रकाशित, उसी साधना की व्याख्या है, जहां दशरथ कुमार राम, त्याग और तपस्या से गुजरते हुए मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की पूर्णता को प्राप्त करते हैं।

आज लखनऊ में इस महत्वपूर्ण पुस्तक का विमोचन हुआ। यह केवल साहित्यिक विमोचन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विमर्श का उद्घाटन था क्योंकि इस कृति में राम के जीवन और कैकेयी के मातृत्व को नए दृष्टिकोण से परखा गया है।

इस कृति का मूल प्रश्न यही है कि जब स्वयं राम यह जानते थे कि उनकी जीवन-यात्रा का पाथेय उनकी मझली माता कैकेयी हैं, तो फिर संसार ने इस सत्य को स्वीकार क्यों नहीं किया?

इतिहास ने कैकेयी को दोषिणी बना दिया, किंतु राम के अंतःकरण में वे आदर्श प्रेरणा और उज्ज्वल पथप्रदर्शक बनी रहीं।

वनवास की संपूर्ण यात्रा केवल ‘तापस-वेश विशेष’ का प्रसंग नहीं थी, बल्कि यह यात्रा मूल्यों की पुनर्स्थापना थी। मर्यादा, सहनशीलता, आदर, सामूहिकता, समभाव, समरसता, सहजता, सरसता, न्यायप्रियता, संघर्ष और साहस आदि ये सब उसी पथ के प्रतिमान बने। रामपथ से लेकर रामसेतु तक हर कड़ी इसी तपःपथ का बिम्ब थी। यही उनकी दिव्यता का मानवीय शिखर था, जिसे उन्होंने संसार को अपने जीवन के प्रतिदान स्वरूप दिया।

यह ग्रंथ संवादों की शैली में लोकमानस तक पहुंचने का प्रयास करता है। ऐसे संवाद, जो राम के आदर्शों और त्याग को वर्तमान की चेतना में गूंथकर संस्कृति की एक विराट माला बना देते हैं। वह माला केवल पुष्पों से नहीं, बल्कि त्याग और सुगंधित स्मृतियों से निर्मित है और अतीत से उठकर आज भी हमारे मानस को स्पंदित करती है।

पुस्तक से उद्धरण

“रिपुंजय! हमारा लक्ष्य कालजयी था, अतः बहुत कुछ समय के गर्भ में रहना ही उचित था और अपेक्षित भी। बस इतना ही कहना समीचीन होगा कि मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता था कि आप अयोध्या के राजमहल की सरस परिधियों के पीछे अपने जीवन के सार को तिरोहित कर दें। जबकि आपकी मझली माता कैकेयी इससे बहुत आगे की सोच रही थीं। वे आपके जीवन के हर अध्याय में आपकी जय लिखी हुई देखना चाहती थीं। वे अल्पविरामों में बंधी हुई उपलब्धियों और विरामों में उलझी यशगाथाओं को आपके जीवन में कोई स्थान देना नहीं चाहती थीं।”
(कैकेयी के विषय में राम से बताते हुए गुरु वशिष्ठ)

राम ने स्वयं अपनी माता कैकेयी के निर्णय को जीवन का अभिप्राय माना। उनके लिए वनवास केवल राजपाट से दूरी नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म का पाठ था। उन्होंने कैकेयी के आदेश को कर्तव्य और साधना दोनों के रूप में ग्रहण किया।

“माता! यदि आप ने मुझे वन जाने का आदेश पिताश्री के माध्यम से न दिया होता तो मुझे यह पता ही नहीं चलता कि इस राष्ट्र की रक्षा सैनिक ही नहीं आटविक भी करते हैं, योद्धा ही नहीं ऋषि भी करते हैं, अंतेवासी ही नहीं वनवासी भी करते हैं। इसके समृद्ध और सुदीर्घ होने की कामना केवल राजसिंहासन पर विराजे हुए राजा ही नहीं करते हैं अपितु उस देश की सीमाओं के भीतर रहने वाली वन्य जातियाँ और पशु-पक्षी भी करते हैं। हमारी विजय, हमारे यश और हमारी समृद्धि में उनका भी योगदान होता है। बस वे कभी अपना भाग आपसे मांगने नहीं आते, वे तो परमार्थ को ही अपना पुरुषार्थ समझते हैं।”
(माता कैकेयी को वनवास का अभिप्राय बताते हुए राम)

यह पुस्तक क्यों पढ़ी जाए?

‘कैकेयी के राम’ केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि रामकथा के अनदेखे आयामों पर गंभीर विमर्श है। इसके पढ़ने के पांच प्रमुख कारण हैं…

कैकेयी का पुनर्मूल्यांकन: परंपरागत रामकथा ने कैकेयी को दोषिणी ठहराया। यह कृति उन्हें राम के त्याग और आदर्श की आधारशिला सिद्ध करती है। इस दृष्टि से यह पुस्तक इतिहास और लोकमानस की एकतरफा छवि को तोड़ती है और मातृत्व का नया आयाम उद्घाटित करती है।

रामकथा का नया परिप्रेक्ष्य: यह पुस्तक दिखाती है कि राम की मर्यादा और आदर्श केवल वनवास की पीड़ा से नहीं, बल्कि कैकेयी की दूरदर्शिता से उपजे। यह दृष्टिकोण पाठक को सोचने पर मजबूर करता है कि हम किन पात्रों को केवल परंपरा की दृष्टि से देखते रहे हैं।

संवाद शैली की जीवंतता: पूरी कृति संवादों पर आधारित है। गुरु वशिष्ठ और राम के संवाद, राम और कैकेयी के संवाद ये पाठक को सीधे घटनाओं और पात्रों के अंतर्मन में ले जाते हैं। यह शैली न केवल कथा को रोचक बनाती है, बल्कि चिंतन को भी गहन करती है।

आज के समाज के लिए संदेश: यह पुस्तक बताती है कि त्याग, सहिष्णुता, न्यायप्रियता और समभाव केवल रामयुग के मूल्य नहीं, बल्कि आज भी राष्ट्रनिर्माण के लिए अनिवार्य हैं। यह कृति हमें वर्तमान संदर्भों में यह सोचने का अवसर देती है कि नेतृत्व और मातृत्व किस तरह समाज की दिशा बदल सकते हैं।

साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व: डॉ. रहीस सिंह जैसे गंभीर चिंतक की लेखनी और वाणी प्रकाशन का प्रकाशन-मानक इस पुस्तक को साहित्य, इतिहास और संस्कृति तीनों ही स्तरों पर महत्वपूर्ण बना देता है। यह केवल पढ़ने का अनुभव नहीं, बल्कि चिंतन और आत्ममंथन की यात्रा भी है।

इस पुस्तक को पढ़ना इसलिए भी आवश्यक है कि यह केवल राम की कथा नहीं सुनाती, बल्कि हमारे भीतर छिपे प्रश्नों को जगाती है। यह बताती है कि जिन पात्रों को हम दोषी मानते आए, वे कभी-कभी सबसे बड़े पथप्रदर्शक होते हैं। ‘कैकेयी के राम’ पढ़कर हम न केवल राम के त्याग को, बल्कि मातृत्व की उस विराटता को भी समझ पाते हैं जिसने राम को ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ बनाया।

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