वैश्विक बाजार में बढ़ रही भारत की हिस्सेदारी, निर्यात को मजबूत कर रहा देश का रक्षा उत्पादन

गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के घरेलू रक्षा क्षेत्र में विकास का प्रमुख चालक अब निर्यात बन गया है। सरकार आने वाले वर्षों में देश की वैश्विक मौजूदगी को काफी बढ़ाने के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय कर रही है।

रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 236 अरब रुपये तक पहुंचा

रिपोर्ट के अनुसार, भारत का रक्षा निर्यात वित्तीय वर्ष 2014 में 6.8 अरब रुपये से बढ़कर FY25 में 236 अरब रुपये तक पहुंच गया है। रक्षा मंत्रालय का लक्ष्य इसे FY27 तक 350 अरब रुपये और FY29 तक 500 अरब रुपये तक ले जाना है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह वृद्धि न केवल घरेलू उद्योग को मजबूती देती है, बल्कि भारत की वैश्विक रक्षा बाजार में हिस्सेदारी को भी बढ़ा रही है।

वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए देश को क्या करने की जरूरत?

रिपोर्ट में निर्यात के लिए तैयार प्रमुख उत्पादों की पहचान की गई है, जिनमें स्वदेशी एवियोनिक्स से लैस तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमान, प्रचंड हल्का लड़ाकू हेलीकॉप्टर, नौसैनिक फ्रिगेट और कॉर्वेट, और आकाश-एनजी व क्यूआरएसएएम जैसी मिसाइल रक्षा प्रणालियां शामिल हैं। इसके अलावा, भारतीय कंपनियां एयरोस्पेस निर्माण में इस्तेमाल होने वाली उच्च-मूल्य वाली सामग्रियों, जैसे टाइटेनियम और सुपर अलॉयज, के क्षेत्र में भी अपनी पकड़ मजबूत कर रही हैं।

अनुमानित 100 अरब डॉलर के वैश्विक हथियार बाजार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए, भारतीय रक्षा कंपनियों को सिर्फ पुर्जी से आगे बढ़कर संपूर्ण प्रणालियां और प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने होंगे। मित्र देशों ने ब्रह्मोस मिसाइल, पिनाका तोपखाना प्रणाली और आकाश वायु रक्षा प्रणालियों जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म में पहले ही रुचि दिखाई है।

भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रक्षा खर्च करने वाला देश है, लेकिन रक्षा उपकरणों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक भी है। देश अब अपने लड़ाकू विमान, उपग्रह और रडार खुद डिजाइन और बनाता है, और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर अपनी निर्भरता काफी कम कर चुका है।

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